Tuesday, July 7, 2009

साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
चल रहा है तारकों कादल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी हैशून्य में भ्रमता-भ्रमाता,
पाँव के नीचे पड़ीअचला नहीं, यह चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भीएक थल पर टिक न पाता,
शक्तियाँ गति की तुझेसब ओर से घेरे हुए है;
स्थान से अपने तुझेटलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
थे जहाँ पर गर्त पैरोंको ज़माना ही पड़ा था,
पत्थरों से पाँव केछाले छिलाना ही पड़ा था,
घास मखमल-सी जहाँ थामन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ परतन जुड़ाना ही पड़ा था,
पग परीक्षा, पग प्रलोभनज़ोर-कमज़ोरी भरा तूइस तरफ डटना उधरढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
शूल कुछ ऐसे, पगो मेंचेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवशकरते, हमेशा
जबकि गड़ते,शुक्रिया उनका कि वेपथ को रहे प्रेरक बनाए,
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकनेके लिए मजबूर करते,
और जो उत्साह कादेते कलेजा चीर, ऐसेकंटकों का दल तुझेदलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
सूर्य ने हँसना भुलाया,चंद्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भीतारिकाओं को जगाना,
एक झोंके ने बुझायाहाथ का भी दीप लेकिनमत बना इसको पथिक तूबैठ जाने का बहाना,
एक कोने में हृदय केआग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझेजलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
वह कठिन पथ और कबउसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करकेभी अभी तक फूलती है;
यह मनुज की वीरता हैया कि उसकी बेहयाई,
साथ ही आशा सुखों कास्वप्न लेकर झूलती हैसत्य सुधियाँ,
झूठ शायदस्वप्न, पर चलना अगर है,झूठ से सच को तुझेछलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

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